Friday, 28 December 2018

महापर्व छठ

आस्था का महापर्व छठ आज पूर्ण हुआ।और बाल दिवस भी है तो आइए एक अबोध बालक की कहानी सुनते है।

बालक छठ से दो-तीन दिन पहले अपने दोस्तों के साथ खेल रहा होता है। तभी एक दोस्त बोलता है कि अब खेल खत्म किया जाए और चल कर छठ के लिए घाट बनाया जाए। सभी बच्चे अपने घर कुदाल,टोकरी, खुरपी,झाड़ू आदि लेने जाते है।

इस गाँव मे विद्यालय के खेल मैदान में ही पूरा गांव छठ करता है 1500…1600 के लगभग इस गांव की जनसँख्या है। तो इस मैदान में ही बेदी बना कर बेदी के दोनों तरफ छोटा छोटा गढ़ा पोखरा रूपी बनाया जाता है। क्यों कि इस गांव में नदी,तलाब,पोखर नही है।

एक बच्चे के अलावा सभी बच्चे साफ-सफाई करने के समान ले कर मैदान में पहुँचते है। और सब मिलकर उस मैदान को साफ करते है जहां एक तरफ विद्यालय है तो दूसरी तरफ कुछ लोगो के गाय भैस के गोबर पाथा गया है वही तीसरी तरफ गढ़ा कर दिया गया है। तभी एक बच्चे को ध्यान आता है कि अरे वो तो आया ही नही तब दूसरा बच्चा बोला कि अरे उसके यहां छठ नही होता है तो वो नही आया होगा। तब तीसरा बच्चा बोलता की छोड़ो ना वो नही आया तो क्या हुआ । बच्चो की काम देखकर एक चाचा बोले कि अरे वाह तुम लोग बहुत सुंदर काम कर रहे हो। छठ के दिन तुम सबको मैं पटाखे दूंगा। थोड़ा इधर भी साफ कर देना।

इधर वो बच्चा अपने घर से साफ सफाई का सामान लेकर चला ही था कि उसकी बड़ी दादी बोलती है हई देखs नबाब के जतहत बाड़े ना... ओ से बड़ कुदाल ले ले बाड़े.. का करबs...ये सुनते ही माँ दौड़ी आती है और कुदाल ले कर रख देती है। और पूछती है कि क्या करना है कुदाल से ...कही पैर पर लग जाये तो.. बच्चा बड़े प्यार से बोलता की आज सब छठ के लिए साफ सफाई कर रहा है तो हम भी जा रहे है तो माँ बोलती है अपने घर छठ नही छठ नही होता है जिसके घर छठ होता वो सब साफ सफाई कर रहे है और तुम इतना छोटे हो कि क्या साफ सफाई करोगे । माँ के बात सुनकर बच्चा को बहुत दुःख होता है कि सब के घर छठ हो रहा है मेरे घर नही होगा..मेरे सभी दोस्त को नया नया कपड़ा ख़रीदायेगा .. सब के घर बाहर से (जो नोकरी करते या शहरों में रहते वो आ रहे है ) सब आ रहे है। उदास हो कर अपने बड़े पापा के पास जा कर बोलता है (ये बच्चा माँ के बाद सबसे ज्यादा अपने बडे पिता अवधेश पाण्डेय से प्यार करता है) की पापा अपने घर छठ क्यों नही होता है ..अगले साल अपने घर भी छठ करना ..बड़े पापा प्यार से बच्चे को समझाते है। हमलोगों को छठ करना  सहता(शुभ नही होता है) नही है बच्चे का दिल टूट जाता है।


उदास मन से विद्यालय के मैदान में जाता है.. जहां छठ के लिए साफ सफाई उसके दोस्त कर रहे है। एक दोस्त देखते ही बोला अब आ रहे हो जब सब साफ हो गया.. तभी एक चाचा बोलते है कि इसके घर छठ नही होता है तो ये साफ सफ़ाई करेगा... तो बच्चा उसी चाचा से पूछता है कि क्यों मेरे घर छठ नही होता है तो मजाक में बोल देते है कि पैसा बचाने के लिए नही होता है ...हा.. हा ..हा हँसते है। वो घर से उदास हो कर आया ही था कि यहाँ भी उसे ताने सुनने को मिल गया।

छठ के दिन सुबह बड़े लोगो द्वारा छठ घाट को बहुत अच्छे से तैयार कर लिया जाता है पूरा मैदान में बेदी ही बेदी नजर आता है उस बच्चे के पड़ोस की एक दादी जिन्हे पूरा गांव चाची कहता है उनका खबर आता है कि शाम को बच्चों को तैयार कर के मेरे घर भेज देना...मेरे घर से ही सब छठ घाट जाएंगा। शाम को सब छठ घाट जाते है गांव के सब लोग एक साथ नजर आते है बहुत खुशी ख़ुशी शाम का पूजा होता है। दूसरे दिन सुबह में छठ घाट जाने के लिए माँ चार बजे से ही जगाना शुरू कर देती है.. फिर तैयार कर के दादी के साथ छठ घाट पहुँच जाते है पर बच्चे मन मे यही बात खटकते रहता है क्या सच मे पैसों के लिए छठ नही होता है.. इसी आहो..पहो में है तब तक भास्कर जी उदित होते है और सब लोग अर्घ्य देते है और प्रसाद बाटते हुए अपने अपने घर जाने लगे। हा एक बात है कि छठ मईया के कृपा से जिसके घर छठ होता है उसके घर से ज्यादा प्रसाद जिसके घर छठ नही होता उसके घर हो जाता है।

कुछ दिनों के बाद पता चलता है कि छठ के दिन ही कोई अनहोनी हो गई थी जिसके वजह से छठ नही होता है ... बीच मे कोई कोशिश किया कि फिर से छठ किया जाए तो फिर कुछ अनहोनो हो जाती है ... अब कोई डर से छठ नही करता है।

खैर अब वो बच्चा बड़ा हो गया है सर्विस करने लग गया है छठ में वो अपने सहकर्मियों छुटी जाने देता जिनके घर छठ होता है भले उसे डबल- ट्रिपल ड्यूटी करना पड़े। हां यहॉ भी प्रसादो का ढेर लग जाता है।

दुनिया का सबसे अच्छा समय,
दुनिया का सबसे अच्छा दिन,
दुनिया का सबसे हसीन पल,
सिर्फ बचपन में ही मिलता है,
इसलिए आप सभी को,
बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
✍️अभिषेक पाण्डेय

Tuesday, 25 December 2018

सार्थक संवाद

आज मैं बक्सर स्टेशन जाने के लिए घर से निकला रोड तक आया । एक ऑटो को रुकने का इशारा किया तो ऑटोवाले ऑटो धिरे करते हुए बोले कि जल्दी बैठिए । मैं भी चलते हुए ऑटो में ड्राईवर के पास बैठ गया । बैठते ही ऑटोवाले बोले कि 10 रु लगेगा ।
मैं - हसंते हुए बोला अरे नही च्चा 7 रु लगता है ।
ऑटोवाले - नही 10 रु 4 महीना से हुआ है ।
मैं - मैं तो रोज आता जाता हूं 7 रु ही देता हूं । और कही किराया तो नही बढा है। और ये चार महीने नही ही बोलिये।
ऑटोवाले - हा और कही का किराया नही बढा है । इतना कह कर पेट्रोल पंप वाले को , किराने के दुकानदार को अभद्र -अभद्र गालियां दे कर बोले कि खुदरा (चिल्लर) कौनो लेता ही नही है । तो हम लोग लेकर क्या अचार डालेंगे । ...........इस लिए सीधा 10 रु लगेगा । आप को देना है तो बैठिये नही तो उतर जाइये ।

(इतना संवाद की बीच ऑटो आगे बढ़ता रहा , करीब आधा दूर आ गए थे।)
मैं - हा च्चा ये बात तो सही बोल रहे हैं। पर बढ़ा क्यों दिए 5 रुपया कर देते ।
ऑटोवाले -  देखो बाबू दिमाग मत चाटो  एक तो ऐसे ही दो दिन से दिमाग खराब है ।
मैं - क्यो?
ऑटोवाले - बक्सर में जितना ऑटो व बस है सब का टेप का तार या लाउडस्पीकर निकाल रहा हूं । जितना नया उम्र के लड़के सब चला रहा है न   सब इतना अश्लील गाना बजाता है ।  कि सवारी असहज महसूस करता है ।

मैं - वाह च्चा .. ये तो बहुत अच्छा काम किये है । लेकिन नया लड़का से ज्यादा पुराने ही बजाते है । जैसे कि अभी आप पेट्रोल पंप वाले को , किराने के दुकानदारों को .. बहुत सुंदर भजन सुना रहे थे ।

ऑटोवाले - एक नज़र मेरे तरफ देखे ......... और चुप हो गए।
मैं - कुछ गलत बोल दिया। क्या?
ऑटोवाले - ठीक है बाबू साहब पहले अपने आपको सुधारूँगा । फिर दूसरे को ...

मैं - ऐसा हो तो.... सब अपने सुधार हो जाएगा ।
ऑटोवाले -  आप लोग यही उतर जाइये .. नही तो नगर परिषद वाला 30 रु ले लेगा।  पैसा ले लेता कुछ व्यवस्था नही करता है गालियां भी देते जा रहे थे।(स्टेशन से कुछ पहले)
मैं - फिर शुरू हो गए ।
च्चा - दोनों हाथ जोड़ लिए और बोले कि साहब ... ये लाइन ही ऐसा है । आदत हो गई है।
मैं - 20 रु दिया । कि काट लीजिये।

च्चा- नही साहब ... आप से आज पैसा नही लूंगा । आप मिठाई खा लीजिएगा ।
मैं कुछ बोलता की वो बोले कि रखलो ...मेरा आशीर्वाद समझ लीजिए । ... इतना आदर पूर्वक बात किये ...हमलोग से ऐसा कोई नही बात करता है ।
मैं मुस्कुराता हुआ स्टेशन की तरफ चल दिया । आदर मैन दिया या उन्होंने दिया?
  ========= अभिषेक पाण्डेय =========
संवाद