चली हूं जब से ,ठहरी नही तब से।
जाने कितने चले गए जग से।
उत्तर से दक्षिण ,पूर्व से पच्छिम।
यू दौड़ने में हूं सक्षम।
खड़ा हिमालय से पिघल कर।
जाती हूं कन्याकुमारी चल कर।
अमीर हो या गरीब,ढोती हूं सबका शरीर।
थकती नही हूं मैं, दम लेती हूं पहुँचाकर।
सुनती हूं पोखरण की कथा , जैसलमेर में जलकर।
भारत का अंधकार दूर करती,अरुणाचल से चलकर।
किसी को घर ,किसी को दफ़्तर।
पहुचाने में हर समय रहती हूं ततपर।
लाखों का सहारा हूं अरबो का खजाना हूं।
कर्तव्य है ध्यान रखना,मैं भी एक जनाना हूं।
झेली हूं कई विपदा , झेली हूं मैं सुनामी।
कोरोना अब मत आना, बंद है कईओ के दानापानी।
भारत का अभिषेक(तिलक)हूं, हाँ मैं रेल हूं।
रेल होना कोई खेल नही
झेल जाए ,ऐसा कोई मेल(पुरुष) नहीं।
जमशेदपुर (टाटा) ये पहले
न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन के बाहर खड़ा इस्टीम इंजन
शानदार कविता। रेल और उससे जुड़े आम जनजीवन दोनो को अपने अपने कविता में तरजीह दिया है।
ReplyDeleteझेली हूं कई विपदा, झेली हूं मैं सुनामी।
कोरोना अब मत आना, बंद है कईओ के दानापानी।
भारत का अभिषेक(तिलक)हूं,
हाँ मैं रेल हूं।
रेल होना कोई खेल नही
झेल जाए ,ऐसा कोई मेल(पुरुष) नहीं।
इन पंक्तियों ने दिल जीत लिया।